भारतीय जन-जीवन के साथ रामकथा का बहुत गहरा सम्बन्ध है। रामकथा के प्रथम प्रवक्ता महर्षि वाल्मीकि ने इसे इतनी रमणीय शैली में प्रस्तुत किया था कि वह न केवल परवर्ती कवियों के लिए अक्षय सम्बन्ध प्रदान करती रही, बल्कि साधारण जनता भी अपनी दिनचर्चा की कई जटिल समस्याओं को सुलझाने में इसके विभिन्न प्रसंगों और पात्रों से प्रेरणा लेती रही है। रामकथा के समालोचक इन प्रसंगों और पात्रों को कई दृष्टियों से समझने और समझाने का प्रयास करते रहे। फिर भी यह क्षेत्र इतना उर्वर और विस्तृत है कि इस संबंध में जितना कहा जाय उतना और कहने को रह जाता है। इसी दिशा में एक अभिनव प्रयास है-प्रस्तुत कृति रामायण के महिला पात्र’।
इसमें वाल्मीकि रामायण के मात्र प्रमुख महिला पात्रों का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। ये पात्र हैं-जानकी, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, अहल्या अनसूया, शबरी, स्वयंप्रभा, तारा, मन्दोदरी, त्रिजटा और शूर्पणखा। इन पात्रों की सृष्टि के पीछे महर्षि की मनोभूमिका को हृदयंगम करने में, आशा है, पाठकों को इस कृति से एक नयी दृष्टि मिलेगी।
रामायण केवल राम का अयन नहीं है; बल्कि रामा (सीता) का भी अयन है। दोनों का यह समन्वित अयन है इस बात को मैंने जानकी के विश्लेषण में स्पष्ट किया है। दशरथनन्दन राम और जनकतनया जानकी एक ही तत्त्व के दो रूप हैं। सीता पृथ्वी की पुत्री है और राम आकाश के स्वामी आदित्य के वंशज हैं। पृथ्वी और आकाश अलग- अलग दिखाई देने पर भी तत्त्वतः एक हैं, एक ही ब्रह्माण्ड के पिण्ड हैं।